के पर करीं सिंगार पिया मोर आन्हर (हास्य-व्यंग्य)-श्री घनश्याम सहाय

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◆के पर करीं सिंगार पिया मोर आन्हर◆
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ये एक भोजपुरी लोकोक्ति है जिसमें यह कहा गया है कि पत्नी अपने पति को रिझाने के लिए श्रृंगार करती है। यदि उसका पति ही अंधा हो तो बेचारी श्रृंगार किसके लिए करे। भोजपुरी की इस कहावत का अर्थ बस यहीं तक सिमट कर नहीं रह जाता बल्कि अपने गूढ़ अर्थ को भी बड़ी खूबी के साथ प्रदर्शित कर जाता है---मतलब, इसके गूढ़ अर्थ को जाने तो यह होता है----

गुण के पारखी व्यक्ति के अभाव में गुणवान व्यक्ति की कद्र नहीं होती। बुद्धिमान व्यक्ति की कद्र बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है---मूर्ख की तो इतनी क्षमता ही नहीं कि विद्वता के अमूर्त या मूर्त स्वरूप को जान पाए फिर भी आज के सामाजिक परिवेश में मूर्खता मूर्त है और विद्वता असहाय और अमूर्त। आज के परिवेश में विद्वता अधीनस्थ है मूर्खता के।ये क्या चल रहा है भाई---चल क्या रहा है--फाग चल रहा है। हर ओर बस धुंध ही धुंध और इस धुंध में "विकास" खोजोगे तो कहाँ मिलेगा, फिर भी लगे रहो मुन्ना भाई---प्रयास जारी रहे शायद देश को विकास मिल जाए।

"केकरा पतोह ले उतिमा कम" कहने का तात्पर्य यह है कि अपना कार्य चाहे जैसा भी हो अच्छा ही लगता है।यहाँ हर रोज विकास हो जाने का आडंबर रचा जाता है लेकिन विकास हुआ क्या? 

ना, विकास तो फ़रार है। मूर्धन्य विद्वानों का समूह लगा है विकास ढूँढने में लेकिन विकास तो फ़रार है। यदि चेतनता पर जड़ता को वरीयता दी जाएगी तो कुंठित मेधा का सुस्त पड़ जाना लाज़िमी है और विकास की कल्पना ही कपोल कल्पना सिद्ध होगी।

"ढूँढते रह जाओगे जिद्दी दाग" लेकिन दाग मिलेंगे नहीं।आपने जोर लगाया,अच्छी बात है--जोर लगाना भी चाहिए---बात विकास की है--लेकिन क्या गधा घोड़े की गति दौड़ सकता है?--लेकिन आप तो गधे ही दौड़ा रहे हो, घोड़ों के उपर तो आपका ध्यान ही नहीं। आप अपरिचित नहीं घोड़ो की मेधा, गति और प्रज्ञा से किन्तु महोदय आपको तो गधो से प्रेम है---थोक वोट बैंक हैं।

अधिक प्रज्ञा भी घातक होती, घोड़ों की प्रज्ञा ही घोड़ों के समूह के लिए घातक सिद्ध हो रही है और अपने उपर हुए घात का इलाज भी वे आप से ही करवाते हैं--ये बात तो वही हुई------

"कुजगहा बीछी मरलस आ भसुर झरवइया।"

किसी औरत के आंतरिक अंग में बिच्छू डंक मारता है, यह स्थिति तो अपने आप में कष्टकारक है लेकिन इस कष्ट से मुक्ति का उपाय और कष्टदायक हो गया क्योंकिं बिच्छू का ज़हर उतारने वाला उस औरत का जेठ है, परम्परा के अनुसार देवरानी को जेठ का स्पर्श वर्जित है लेकिन यदि जेठ देवरानी को स्पर्श करता है तो सामाजिक मान्यता भंग होती है और यदि नहीं करता तो ज़हर नहीं उतर पाएगा। दुविधा वाली स्थिति बन जाती है---घोड़ों की भी दशा कुछ ऐसी ही है।

महोदय, आप तो ज़हीन हैं, सबकुछ जानते समझते हैं---अंत में बस एक बात कहना चाहूँगा मेरे सरकार--
"काजर कइला के मोल ना ह, मोल ह आँख मटकवला के।" मतलब यदि आँख मटकाने की कला नहीं जानते तो काजल लगाने का कोई तुक नहीं। जरा समझते इस कहावत के गूढ़ अर्थ को--

पद या किसी वस्तु की सार्थकता तब है जब उसका उचित उपयोग हो--पद की गरिमा निभाने से निबहती है----तो हे मेरे सरकार आपसे निवेदन है----आप गधों से प्रेम कीजिए अगाध प्रेम कीजिए--मैं मना नहीं करता---मेरा बस यह कहना था कि कभी-कभी घोड़ों पर भी ध्यान कर लिया कीजिए। घोड़े भी आपही के संतान हैं।



- ©घनश्याम सहाय

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