मुक्तामणि छंद विधान

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#मुक्तामणि छंद

 यह एक सम मात्रिक छंद है।

विधान – 25 मात्रा, 13,12 पर यति, यति से पहले वाचिक भार लघु-गुरु (12) अर्थात लगा, चरणान्त में वाचिक भार गुरु-गुरु (22 ) अर्थात गागा। कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत।

विशेष – दोहा के क्रमागत दो चरणों के अंत में एक लघु बढ़ा देने से मुक्तामणि का एक चरण बनता है।

इस छंद में सृजन करना बहुत आसान है। यह बिल्कुल दोहे जैसा है, अंतर केवल इतना है कि इसमें दोहे से एक मात्रा भार अधिक होता है और चार चरण होते हैं।अर्थात, दोहा में 13-11 होता है और इसमें 13-12. स्पष्ट है कि यह एक मात्रा चरण के अंत में बढ़ता है, फलतः दोहे का अंत जहाँ गा ल (21) होता है वहाँ मुक्तामणि में वाचिक गा गा(22) ( यानी गा-गा या गा-ल-ल या ल-ल-गा या ल-ल-ल-ल) से अंत होता है।

उदाहरण स्वरूप एक दोहा लिखते हैं-

रचना कैसे है कहो, मुक्तामणि यह छंद।
देकर एक उदाहरण, कह दो विधना चंद।

यहॉं चरणांत में छंद/चंद- यानी गुरु-लघु(गाल) है।

आइये अब मुक्तामणि रचते हैं-

मुक्तामणि छंदस छटा, दोहे के ही अंदर। 
जोड़ लघु एक अंत में, चंद बना ज्यों चंदर।
वैसे का वैसा रहे, विषम पाद अर्धाली। 
छंद हमारा बन गया, चलो बजावे ताली।
 (-नवल)

यहाँ हमारा चार चरण तैयार हो गया। क्रमागत दो-दो चरण तुकांत भी हो गया। प्रति चरण 13+12= 25 मात्रा भी है, तो यही हमारा मुक्तामणि छंद है।

दोहा और मुक्तामणि का विषम पाद अर्धाली (यतिपूर्व) बिल्कुल समान रहता है।

ऊपर के दोहे में हमने 'चंद' शब्द का प्रयोग किया था उसे ही एक लघु वर्ण जोड़कर नीचे 'चंदर' बना दिया। बस इतना ही मूलभूत अंतर है दोहा और मुक्तामणि छंद में।

 एक बात ध्यान दें जैसे 'चंद' शब्द दोहा में प्रयोग किए तो लघु जोड़ कर इसे चंदर, चनदर,चंदन, चंदा, चनदा (इनमें कतिपय मानक शब्द नहीं, केवल स्पष्टीकरण हेतु प्रस्तुत) आदि बना सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मुक्तामणि छंद के अंत में इस तरह के मात्राभार वाले शब्द स्वीकार्य होते हैं।

मुक्तामणि छंद का एक और स्वरचित उदाहरण प्रस्तुत है-

कोयल कूके बाग में, आँगन बौर नवेली।
बालम बतरस के बिना, सूनी पड़ी हवेली।
दीदा फाड़े कोठरी, नजर गड़ाये कोना।
खाट-पाट उच्चाट-सी,बेकल मन से सोना।




-नवल किशोर सिंह
  28-04-2021



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