नई शिक्षा नीति-2020 (आलेख)- मंगलेश सोनी

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★★नई शिक्षा नीति-2020★★


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सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति से आधारभूत परिवर्तन किए गए। केवल रटी हुई शिक्षा प्रणाली को बंद करके अब ज्ञान अर्जित करने और स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान दिया जा रहा है। सामान्य रूप से आज भी 10 वी पास करने वाले विद्यार्थी को यह ज्ञान नही होता था कि उसे क्या करना चाहिए, क्योंकि 10 वी तक विज्ञान, गणित, अकाउंट, कृषि आदि किसी भी विषय पर बात नही होती थी, न ही केमेस्ट्री के पेचीदा समीकरण बताये जाते, न फिजिक्स के नियमो की चर्चा होती, न गणित की प्रमेय, सिद्धांत का वर्णन होता था। केवल 10 वी तक विषय में अभिरुचि के आधार पर ही विषय लेना होता था। जिससे कई विद्यार्थियों को बाद में बहुत परेशानी होती। परन्तु अब ऐसा नही होगा। अब सामान्य शिक्षा में भी विषयों का ज्ञान व जानकारी दी जाएगी, जिससे विषय लेने का पड़ाव आते आते विद्यार्थी मनः स्थिति से विषय के लिए पूतन तैयार हो।

सरकार ने 4 चरणों मे अध्ययन का रोड़ मैप तैयार किया।
मूलभूत चरण (नर्सरी से 2)
प्रारंभिक चरण(3 से 5)
मध्य चरण(6 से 8)
माध्यमिक चरण(9 से 12)

मूलरूप से 6-9 वर्ष के जो बच्चे आमतौर पर 1-3 क्लास में होते हैं, यह वह समय होता है जब उनकी सीखने की क्षमता अन्य से बहुत अधिक होती है, ऐसे समय में हिंदी व स्थानीय भाषा का अध्ययन उनमें आत्मविश्वास का जागरण करेगा। उनके लिए नेशनल मिशन शुरू किया जाएगा ताकि बच्चे बुनियादी साक्षरता और न्यूमरेसी को समझ सकें। स्कूली शिक्षा के लिए खास करिकुलर 5+3+3+4 लागू किया गया है, इसके तहत 3-6 साल का बच्चा पूरे देश में एक ही तरीके से पढ़ाई करेगा ताकि उसकी फाउंडेशन लिटरेसी और न्यूमरेसी को बढ़ाया जा सके। इसके बाद माध्यमिक स्कूल याने 6 से 8 कक्षा में सब्जेक्ट का इंट्रोडक्शन कराया जाएगा, फिजिक्स के साथ फैशन की पढ़ाई करने की भी अनुमति होगी, कक्षा 6 से ही बच्चों को कोडिंग सिखाई जाएगी, अर्थात हर विषय का ज्ञान 6 से 8 वी तक दिया जाएगा जिससे अगली कक्षा में विषय लेते समय कोई विस्मय मन में ना हो। 

5वीं तक हर विद्यार्थी को हिंदी पढ़ना अनिवार्य होगा, इससे हिंदी से दूर होती हमारी पीढ़ी पुनः हिंदी के निकट आ सकेगी। चिंतनीय बात है स्वतंत्रता के बाद भी हिंदी को न्यायोचित स्थान न संविधान में मिला न जन तंत्र में। जिस हिंदी को अनिवार्य रूप से राजकाज की भाषा मे स्थान मिलना चाहिए था, वह उपेक्षित रह गई। चाहे कोई भी विभाग हो या प्रदेश हिंदी में सूचना, आवेदन, कार्यवाही इत्यादि को संवैधानिक अनुमति मिले। संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हिंदी में संचालन के लिए बाध्य हो, विसंगति है जो सुप्रीम कोर्ट में आज भी अंग्रेजी ही अनिवार्य मानी गई है, यह भारत का कानून कैसे हो सकता है ? जो न्याय पाने के लिए अंग्रेजी को बाध्य करे। इसी प्रकार विभिन्न प्रदेशों में सरकारें वोटबैंक के लालच में सरकारी बोर्ड पर हिंदी के साथ उर्दू को सम्मिलित कर देती है, यह भी बहुत निंदनीय है, आवश्यकता ही क्या है ? किसी अन्य भाषा मे लिखने की जबकि हर भारतीय हिंदी जानता है, फिर भी वेटबैंक के लालच और स्वयं को मुसलमानों का पक्षधर बताने की होड़ ने बोर्ड व प्रशासनिक कार्यालय के बाहर उर्दू को स्थान देना आरंभ किया। यह विभाजन अंग्रेज भी कर चुके थे, ताकि आगे जाकर हिन्दू मुस्लिम में विवाद बढ़े। जबकि भारत में हिंदी के अतिरिक्त अन्य किसी भी भाषा को महत्व देने की आवश्यकता ही नही।

सरकार ने नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए सरकार काम कर रही है। दुनिया के छात्रों को भारत में पढ़ने के लिए सुविधाएं दी जाएंगी। भारत के छात्रों को भी एशिया, अफ्रीका के देशों में भेजा जाएगा। राष्ट्रीय पुलिस विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। डॉक्टरों के लिए एक ब्रिज प्रोग्राम शुरू किया जाएगा, ताकि प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को प्रोफेशनल बातों के बारे में सिखाया जा सके। इससे विदेश में हमारी साख और बढ़ेगी। वेसे भी विश्व में काम करने वाले डॉक्टर व इंजीनियर की संख्या में हमे बहुत अग्रणी है। अब नई शिक्षा नीति के कारण जब विद्यार्थी 3 भाषाओं का अध्ययन करेंगे तो विश्व में अनेक अवसरों में अपना स्थान बना पाएंगे।

मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू किया गया है, आज की व्यवस्था में अगर चार साल इंजीनियरंग पढ़ने या 6 सेमेस्टर पढ़ने के बाद किसी कारणवश आगे नहीं पढ़ पाते हैं, तो कोई उपाय नहीं होता, रास्ते बंद हो जाते है, लेकिन मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम में 1 साल के बाद सर्टिफिकेट, 2 साल के बाद डिप्लोमा और 3-4 साल के बाद डिग्री मिल जाएगी. स्टूडेंट्स के हित में यह एक बड़ा फैसला है, जिससे विद्यार्थियों के लिए नए अवसर खुलेंगे, हर वर्ष की पढ़ाई के बाद वह नए अवसरों के लिए प्रयास कर सकता है। रिसर्च में किया गया बदलाव, प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि जो रिसर्च में जाना चाहते हैं उनके लिए 4 साल का डिग्री प्रोग्राम होगा। जबकि जो लोग नौकरी में जाना चाहते हैं वो तीन साल का ही डिग्री प्रोग्राम करेंगे, लेकिन जो रिसर्च में जाना चाहते हैं वो एक साल के एमए (MA) के साथ चार साल के डिग्री प्रोग्राम के बाद पीएचडी (PhD) कर सकते हैं, इसके लिए एमफिल (M.Phil) की जरूरत नहीं होगी। इससे हम और अधिक बेहतर डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट, सैनिक देश को दे सकेंगे। साथ ही देश के वीरता के इतिहास और महापुरुषों को उनके विराट व्यक्तित्व के साथ जाननेे का अवसर विद्यार्थियों को मिलेगा साथ ही भारत के प्राचीन विद्याओं वैदिक साहित्य कलाओं तथा क्षमताओं को देश की यह आने वाली पीढ़ी जान सकेगी। 

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--मंगलेश सोनी
युवा लेखक व स्वतंत्र टिप्पणीकार
मनावर जिला धार, मध्यप्रदेश

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