मन-घसियारा - गीत

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#गीत *मन-घसियारा*

मन-घसियारा भटक रहा है, यादों के जंगल में।
हरियाई जो लगतीं घासें, आज फँसीं दलदल में।

भावों की भूखी भेड़ों को, कैसे हम समझाएँ?
चारा पाकर भी बेचारा, उनको क्या बहलाएँ?
हँसिया हाथों से जा उलझी, ज्वारों के डंठल में।

संबंधों की सरित सिसकती, कुम्हलाए शतदल भी ।
शैवालों के स्वार्थ-बोध से, मलिन हुआ है जल भी।
नाच रहा है मोह-मयूरा, छलना के अंचल में।

कपट सँपेरा बनकर बैठा, मंद-मंद मुस्काए।
पगडंडी पर अजगर धरकर, हमको पास बुलाए।
चिंतन के चंदन से लिपटे, विषधर भी मंडल में।

ऊब-दूब की गठरी में फिर, भरें कहाँ से गन्ना।
चौलाई की चतुराई से, बथुआ भी चौकन्ना।
चल घसियारे वापस हो ले, फिर से रेत-महल में।

--©नवल किशोर सिंह /12.08.2026
#नवगीत





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