बोरसी - गीतिका
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#गीतिका
बोरसी रात भर ज्यों सुलगती रही।
रूपसी त्यों विरह से सुबकती रही।
बात ही बात में बात छेड़ी मगर,
बात होठों पे आकर मुकरती रही।
याद की धूप में मन विचरता रहा,
देह ठंढ़ी चुभन से सिहरती रही।
भोर की आस ने आँख खोली मगर,
ओस आँखों से चुपके ढरकती रही।
अनमने द्वार पर, अधबनी अल्पना,
रेत हाथों से थककर फिसलती रही।
--©नवल किशोर सिंह
18.07.2026

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