प्रणय की पहेली (गीत )

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**प्रणय की पहेली ** 
गीत 

छद्ममय मनुहार छंदित,
प्रेम या व्यापार चक्रिल? यह पहेली है अजानी।

प्रीति की पुरवाइयों से।
शाम की शहनाइयों से।
जब प्रणय की बात होती।
मोदिनी मधुरात होती।

तन समर्पित, मन समर्पित,
प्रेम-जय या हार तंद्रिल? यह पहेली है अजानी।

प्रात लेकिन भिन्न हरदम।
स्वप्न सुख फिर छिन्न हरदम।
रात्रि के अनुघात पर फिर।
पात के हर गात पर फिर।

बह रही अंजान ढुल-ढुल,
अनमनी-सी धार ऊर्मिल। यह पहेली है अजानी।

मोम क्षण-क्षण गल अकारण।
बह रहे बन ओस के कण।
सूर्य किरणों से विसिंचित।
सप्तरंगी भास दर्शित।

इस चमक के पृष्ठतल में,
है अलख संचार धूमिल। यह पहेली है अजानी।

रात के अनुवाद को फिर।
अनकहे संवाद को फिर।
घूरकर दुनिया तकेगी।
बतकही में कुछ कहेगी।

स्वार्थ के अनुबंधनों में,
सम्मिलित अभिसार पंकिल। यह पहेली है अजानी।

--©नवल किशोर सिंह
11/02/2026
#छंद

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