मधुमासी सवैया

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मधुमासी सवैया 
(दुर्मिल/ चंद्रकला सवैया, 8x सगण, 24 वर्ण।)

1.
ऋतुराज विराज रहे वन में, मन में रहसे रतिराज सखी।
कजरा गजरा बहु व्यंजन से, धन यौवन का सुख साज सखी।
लचकी लहरी चलती मग में, मुख मंडल में लस लाज सखी।
महुआ मधुपान किए न कभी, पग क्यों बहका फिर आज सखी।

2.

मधुमास लिए मुखहास सखी, वन प्रांतर में नित घूम रहा।
मलयानिल का अवमर्श भला, पट अंचल चंचल झूम रहा।
मदमोहित मानस मंडल में, मदनाशय का मच धूम रहा।
भँवरा छलिया मधु गुंजन ले, कलिका-मुख-मंजुल चूम रहा।

---©नवल किशोर सिंह
 05/02/2026


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