दैनिक श्रेष्ठ सृजन-28/04/2021

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साहित्य संगम संस्थान
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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-28/04/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी- 
1.आ.दीपमाला तिवारी
 2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. आभा चौहान 'आभ' जी
2.आ. कैलाश चंद साहू जी
3. आ. ब्रह्मनाथ पाण्डेय' मधुर' जी


श्रेष्ठ टिप्पणीकार- 
1.आ. उमा वैष्णव जी
           
      
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 हौसला  -लघु कथा

दसवीं कक्षा में पढ़ने वाला विजय बहुत ही होनहार बच्चा था। एक अकस्मात में उसे अपनी दोनों टांगे गुमा दी। इस दुर्घटना के बाद में बहुत ही निराश हो गया। एक दिन चारपाई पर लेटा हुआ वो अपनी किस्मत को कोस रहा था कि उसने अपने छोटे भाई को एक कविता की पंक्तियां गुनगुनाते हुए सुना। वह पंक्तियां कुछ इस प्रकार थी "
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' 
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती"।
इन पंक्तियों को सुनकर विजय के अंदर न जाने कहां से हिम्मत आ गई और उसने अपना हौसला इकट्ठा किया और पढ़ाई शुरू कर दी इसके बाद विजय ने अपनी कमजोरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद विजय मैं आई.ए.एस की परीक्षा दी और वह पास हो गया। अपने हौसले के कारण विजय ने वह हासिल कर दिखाया जो सामान्य लोगों के लिए भी बहुत मुश्किल काम है।



स्वरचित रचना 
आभा चौहान 'आभ'
अहमदाबाद गुजरात

★★★■■■★★★

 होंसला--लघुकथा


तीन दिन पहले की बात है जब मै उठा तो सारा मोहल्ला जगा हुआ था सारे लोग अपने अपने घरों में खड़े थे। मै भी सारा मंजर देख घबरा गया और छत से बाहर निकलकर कुछ लोगो से पूछा। तो उन्होंने बताया कि मोहन चाचा के सांस में तकलीफ है और ये सुनकर कोई भी चाचा के पास नहीं आया। चाचा सांस से परेशान थे और बूढ़ी दादी चाचा विलाप कर रहे थे कि कोई तो चाचा को दिखा लाओ।

 मैंने हिम्मत नहीं हारी मास्क लिया लगाया हाथो में जुराब पहने और उनके पास जा पहुंचा, उनको समझाया आप घबराए नहीं और एम्बुलेंस को फोन किया। दस मिनट में एम्बुलेंस अा गई चाचा को अस्पताल ले गए। जांच हुई और चाचा नगेतिव थे दो दिन में ही चाचा घर अा गए। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, होंसला बनाए रखा।
आज सब कुछ ठीक है।।



कैलाश चंद साहू
बूंदी राजस्थान

★★★★★★

 हौसला

          राजा ब्रूस अपने दुश्मन से कयी बार पराजित होने के बाद डर से एक गुफा में जाकर छिप गया| समय बीतता रहा| एक दिन उसने देखा कि एक मकड़ी जो गुफा की दीवार पर चढ़ती और गिर पड़ती| इस प्रकार सोलह बार असफल हुई| लेकिन उसका हौसला बुलंद था| सत्रहवीं बार कोशिश की और दीवार पर चढ़ने में सफल रही| यही राजा ब्रूस के मन में एक जज्बा पैदा कर दिया| उसने सोचा कि अगर यह सफल हो सकती है तो क्या मैं नहीं| यही बिचार उसे गुफा से बाहर लाया| उसने एक सेना पुनः संगठित किया और दुश्मन से टक्कर लिया| मकड़ी की तरह उसका भी हौसला बुलंद था और विजयश्री प्राप्त किया| हौसला अगर कायम है तो कठिन से कठिन काम भी पूर्ण किया जा सकता है|



                 स्वलिखित/ मौलिक
             ब्रह्मनाथ पाण्डेय' मधुर'
ककटही, मेंहदावल, 
संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश

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