दैनिक श्रेष्ठ सृजन-26/04/2021

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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-26/04/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी- 
1.आ.दीपमाला तिवारी
 2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. तुलसीराम 'राजस्थानी' जी
2.आ. कवि आदित्य गुप्त पदयात्री  जी
3. आ. महेन्द्र सिंह कटारिया  जी


श्रेष्ठ टिप्पणीकार- 
1.आ. अजय कुमार तिरहुतिया जी
           
      
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 निबन्ध : मानव मूल्य
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          पहले के जमाने में लोग अधिकतर अनपढ़ हुआ करते थे, बहुत कम लोग भाग्यशाली होते थे जो थोड़ा-बहुत पढ़-लिख पाते थे। अशिक्षा के बावजूद भी लोगों में आपसी प्रेम व भाईचारा देखने को मिलता था। लोग आपस में मिलजुल कर रहते व एक-दूसरे के सुख-दुःख में बराबर के भागीदार होते थे। प्रेम, ममता, सद्भावना, त्याग व एक-दूसरे के प्रति 
समर्पण की भावना ही मानवीय मूल्य कहे जाते हैं।
बड़ी विडम्बना की बात है कि आज प्रत्येक घर में डिप्लोमा-डिग्रीधारी लोग मिल जाएंगे, लेकिन शिक्षा के विस्तार के बावजूद भी आज हमें कैसे-कैसे अपराध देखने-सुनने को मिलते हैं, ये किसी से कुछ छिपा हुआ नहीं हैं।

          हमारी संस्क्रति 'विश्व बन्धुत्व की भावना' वाली रही है। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की विचारधारा हमारे देश की परपम्परा का हिस्सा है। हमारे शास्त्रों में 'यत्र पूज्यन्ते नार्यस्तु, तत्र रमन्ते देवताः' नारी के प्रति सम्मान की भावना को दर्शाता है। इन्ही मूलभूत भावनाओं के बलबूते कभी हमारे देश को विश्वगुरु का दर्जा हासिल था। लेकिन गुलामी के काल में पहले मुगलों ने व बाद में अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने का काम किया। जैसे-जैसे हम हमारी संस्कृति को छोड़ते गए, वैसे-वैसे ही हमारे मानवीय
मूल्यों का भी बड़ी तेजी के साथ पतन होता गया।

          रही-सही कसर मोबाइल और टीवी ने पूरी कर दी है। जबसे हमारे घरों में मोबाइल और टीवी ने प्रवेश किया है, हमारी संस्कृति को भी बट्टा लगना शुरू हो गया है। इंटरनेट के इस दौर में फूहड़पन की सारी हदें पार होती जा रही है। सबसे बड़ा नुकसान मानव मूल्यों को पहुंचा है। आज ऐसे-ऐसे घिनौने अपराध देखने को मिल रहे हैं कि खून के रिश्ते भी अब तार-तार होने लगे हैं। इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि जो मां-बाप अपनी सन्तान की ख़ुशी के लिए अपना सारा जीवन न्यौछावर कर देते हैं, वो ही सन्तान सम्पत्ति के बंटवारे को लेकर उनकी हत्या कर देने से भी नहीं चूकती है। इसलिए आज शिक्षा के साथ-साथ अपने बच्चों में संस्कारो का होना बहुत ही आवश्यक हो गया है। संस्कार बचेंगे तो ही मानव-मूल्य बच पाएंगे।
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तुलसीराम 'राजस्थानी'
नावां सिटी (जिला नागौर) राज.
(स्वरचित, स्वप्रमाणित)

★★★★

 मानव मूल्य  - निबंध 


चौरासी लाख योनिओ मे मानव का मूल्य सबसे अच्छा व मुख्य माना गया है ।पृथ्वी माता जब आतंक और अत्याचार से दवी जा रही थी 
तो उन्होने भगवान नारायण से अपने दुख के निवारण के लिए प्रार्थना किया ।भगवान नारायण ने द्वापर मे मानव का रूप धरकर कृष्ण और त्रेतायुग मे श्री राम ने मानव रूप धारण कर पृथ्वी पर के सारे कष्टों को समूल नष्ट किया था
मानव, मानव के साथ साथ भगवान् की श्रेणी मे आता है ।
इस बसुधा पर अनेको संत महात्माओ ने जन्म लिया है जिसे हम ईश्वर के रूप मे जानते है ।
चाहे संत रविदास स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे अनेको तपस्वी है ।जिन्हे हम मानव के साथ साथ ईश्वर रूप मे उनकी पूजा करते है ।
पर आज का मानव मानवता को भूलकर जघन्य से जघन्य अपराध कर रहा है ।उसकी दृष्टि मे मानव का रूपयो मे तौला जा रहा है ।
जहां मानव का मूल्य अनमोल कहा जाता है वही चंद रूपयो के लिए सरेआम हत्या कर दी जा रही है ।क्या रह गया मानव का मूल्य दो कौड़ी का भी नही रह गया ।
जब की मानव परमात्मा के द्वारा किया गया रचना मे से प्रमुख है ।
मानव को चाहिए कि वह मानवता का पालन करे ।पृथ्वी पर जन्म लेने के  मूल्य को समझे ।


स्वरचित व मौलिक 
कवि आदित्य गुप्त पदयात्री 
चुनार मिर्जापुर उत्तर प्रदेश

★★★★■

 मानव_मूल्य

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मानवीय आदर्श एवं उत्तम आचार व्यवहारों से पूर्ण व्यक्ति स्वतः ही सबका चहेता बन जाता है।
वह अपनी इस निपुणता, प्रवीणता के अनुग्रह से हर क्षेत्र में सदैव उच्च ओहदे के साथ सर्वोत्तम मान-सम्मान भी प्राप्त करता है।
 पाश्चात्य संस्कृति के दौर में आज की युवा पीढ़ी को सही राह दिखाने की जिम्मेदारी समाज के वरिष्ठ वर्ग का ही है। घर परिवार में अपने बच्चों को बदलते परिवेश में संस्कारवान,धीर,शील बनाने में एक माता-पिता व बड़े बुजुर्गों की अहम भूमिका होती है। हर अभिभावक चाहता है की उनकी संतान एक कर्त्तव्यनिष्ठ नागरिक के साथ साथ ऊर्जावान नेतृत्व प्रदान करने लायक बनें।
 व्यक्ति के बचपन में सीखें मानवीय मुल्य उसे जीवन भर काम आता है। इसमें यह कहने में  कोई अतिश्योक्ति नही होगी कि प्राथमिक शिक्षा दौरान ही वह संस्कारित जीवन मूल्यों के पायदान पर अपने कदम बढ़ाते हुए जीवन पथ पर अग्रसर होता है।अनुशासन व कर्त्तव्यनिष्ठा के भाव जो बचपन में उसने अपने अबोध ज्ञान से सीखा वह उसके जीवनपर्यन्त काम आता है। बचपन में एक बालक जिस तरह के जीवन मूल्यों से प्रभावित होता है,आगे चलकर वह वैसा ही बन जाता है। एक अच्छे शिक्षक द्वारा एक सानिध्य प्रदाता के रूप में उसे खेल खेल में ही कहानी किस्सों,अपने सहपाठियों के आपसी बर्ताव से वह बहुत कुछ सीख पाता है और उसी का अनुगमन करने लगता है।
उसे अच्छा माहौल श्रेष्ठ मित्र मंडली के साथ से ही मिलता है। वह चलकर वह समाज का एक व्यवहारशील ,ज्ञानवान, ईमानदार नागरिक बनता है।
एक माता-पिता,शिक्षक, मुखिया के नाते उसे बचपन से ही सही मूल्यों का एहसास करवाना चाहिए। जो आगे चलकर आने वाले भविष्य प्रदान करने वाला है।



प्रस्तोता....✍️

महेन्द्र सिंह कटारिया
सीकर,राजस्थान
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