दैनिक श्रेष्ठ सृजन-05/05/2021

www.sangamsavera.in
संगम सवेरा वेब पत्रिका
साहित्य संगम संस्थान
रा. पंजी. सं.-S/1801/2017 (नई दिल्ली)

# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-05/05/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी- 
1.आ.दीपमाला तिवारी
 2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

★नोट:- Top Menu में दिए गए डाउनलोड लिंक से सम्मान-पत्र डाउनलोड 📩 करें।★

हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. संजय गुप्ता देवेश जी
2.आ. ब्रह्मनाथ पाण्डेय' मधुर' जी
3. आ. ऐश्वर्या सिन्हा चित्रांश जी


श्रेष्ठ टिप्पणीकार- 
1.आ. कैलाश चंद्र साहू जी
           
      
                   ******

 मुखिया--   हास्य व्यंग 
------------------------------
मुखिया लेटा छत पर , करवटें रहा बदल
घर में कोई नहीं  चाहे  ,  बुढऊ दे दखल ।
घर में  सारे जन  ,  मोबाइल  में रहें मस्त 
मुखिया बेचारा  इसे चलाने में खाये गश्त। 
खीर पकवान के दिन गये अब फास्ट फूड
बुढापे में दादा को ये देख मिट जाती भूख।
मुखिया खांसे जोर से , हर कोई देता टोक
आगया छत पर कौन करे अब नौंकझौंक ।
बुजुर्ग कर रहा प्राणायाम सांस खेंच लम्बा 
बच्चे सारे हंस रहे , कर म्यूजिक पर जूंबा। 
बुढ़ऊ का हाजमा खराब रहे करे फुसफुस 
खुद ही निकाल कर पी रहा वो लौकी जूस ।
कमर छुक गयी , जूतियाँ फटी घिस-घिस 
परिवार को पाला पोषा खुद को पीसपीस। 
आज नये जमाने की रीत पर क्या है बोले 
उस जमाने को इस जमाने से बस है तोले।
मुसकराता आसमां चांद को देखकर सोचे
अपनी तो कट गयी , खुश रहें मेरे ये बच्चे। 



----------------------------
संजय गुप्ता देवेश 
उदयपुर राजस्थान

★★★★★★★★

 मुखिया:- हास्य व्यंग्य

            एक शहर में एक सनकी राजा था| उसके मुंह से निकले शब्द कानून बन जाते थे| एक दिन वह अपने मंत्रियों से कहा कि मुख्य द्वार पर एक ऐसा गेट बनाया जाए जो अपने आप में एकदम अजूबा हो| फिर क्या था| दूसरे ही दिन राजगीर और मजदूर लग गए और निर्माण शुरू हो गया| बनने के एक दिन बाद राजा घोड़े पर सवार होकर गेट से निकलने लगा और उसका मुकुट उसी में उलझ गया| उसने तुरंत आदेश दिया कि यह गेट गिरा दिया जाए क्योंकि इसने मेरा बड़ा अपमान किया है| किसी ने कहा कि महाराज! यह गेट का दोष नहीं है| यह मुख्य राजगीर की गलती है| राजा ने आदेश दिया कि मुख्य राजगीर को फांसी पर लटकाया जाए| तब राजगीर ने कहा कि महाराज मेरा दोष नहीं है| दोष तो उन  ईंटों का है जो आकार में बड़े थे| जिन ईंटों की नाप पहले ली गई थी, भट्ठे वाले ने उनसे बड़े आकार की ईंट भेज दिया| उसने फिर तुरंत आदेश दिया कि भट्ठे वाले को शूली पर चढ़ा दिया जाए| भट्ठे वाले ने कहा कि दोष मेरा नहीं| दोष तो उस आर्किटेक्ट का है जिसने नक्शा ही गलत बना दिया| फिर उसने आदेश दिया कि आर्किटेक्ट को शूली पर लटका दिया जाए| आर्किटेक्ट आया और विनम्रता से कहा कि महाराज मैनें नक्शा आपको दिखाया था| और आपने उसमें कुछ तरमीम किया था| फिर उसने कहा कि तब मुझे ही शूली पर लटका दिया जाए| फिर वही हुआ जो उसका आदेश था| इस प्रकार उस शहर के लोग उस सनकी राजा से मुक्ति पा गये|




               स्वलिखित/ मौलिक
             ब्रह्मनाथ पाण्डेय' मधुर'
ककटही, मेंहदावल, संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश

★★★■■■■★★★


 मुखिया ----हास्य व्यंग ---- संस्मरण
=======================
मेरे पिता जी डॉक्टर की डिग्री लेने के बाद सन 1955 में पहली बार ससुराल पहुँचे. नानी नाना मामी मामा आदि सभी लोगों ने खूब स्वागत,-सत्कार किया. सभी लोग गदगद हो रहें थे क्यूँकि उनका दामाद गाँव में पहला डॉक्टर था. सभी लोगों के हँसी --- ठहाको से वातावरण आह्लादित हो रहा था.
शाम का समय था. धीरे -धीरे रात हो गई. मेरी नानी ने पापाजी से पुछा --- भईया खाना लाएं खा लीजिये.
पापाजी बोलें --- ओह!! थैंक्यू
आधे घंटे बाद नानी ने फिर पूछा --- भईया, खाना लाएं, खा लीजिये.
दुबारा पापाजी ने कहा ---- ओह!! थैंक्यू
इसीप्रकार से बार -बार नानी आकर पापाजी से खाने के लिए पूछती और पापाजी उनको **** थैंक्यू **** बोलते.
काफी रात हो गई, कोई भी खाना नहीं खाया था क्युकी घर के दामाद जी ने अभीतक खाना नहीं खाया था.
फिर नानी आई और पापाजी से पूछा ---- भईया!! अब तो खाना खा लीजिये, बहुत रात हो गई.
पापाजी ने कहा ---- माताजी!! आप बार -बार खाना पूछ रही हैं और खाना ला नहीं रहीं हैं.
तब नानी ने बड़ी मासूमियत से कहा ---- भईया!! आप ही तो बार - बार कह रहें हैं -----**** थमके *** ( मतलब थोड़ा रुक कर )
पापाजी मुस्कुराते हुए बोलें ----***माताजी!! मैंने आपको धन्यवाद बोला था ****
सब लोग खूब ठहाके लगाकर हॅसने लगे. पापाजी ने बात ही बात में मेरी पहलवान मामा से पूछा ---- भाई!! अक्ल बड़ी या भैस???
पहलवान मामा बोलें --- जीजाजी!! भैस इतनी बड़ी होती हैं उसका दूध हमलोग रोज पीते हैं. हमारा मजबूत शरीर उसी की देन है. रोज कितने लोगों को अखाड़े में पटकता हूँ. इसलिए भैस बड़ी है. अक्ल को तो कभी देखा ही नहीं.
पापाजी चौंक गए. मन ही मन सोचने लगे वाह, क्या ससुराल मिला है, सब एक से बढ़कर एक नमूने हैं.
फिर सोचने लगे, यथा राजा तथा प्रजा. जब घर का मुखिया ही इतना समझदार हैं तो लड़को की क्या बात.
यह किस्सा पापाजी हमेशा लोगों को मज़े से सुनाते थे. सब खूब हँसते थे.



लेखिका
ऐश्वर्या सिन्हा चित्रांश
वाराणसी
नोट
-------- यह मेरे बचपन में मुझे पिताजी अक्सर सुनाया करते थे. सच्ची घटना है
★★■■■■★★★◆★★★

कोई टिप्पणी नहीं

©संगम सवेरा पत्रिका. Blogger द्वारा संचालित.