दैनिक श्रेष्ठ सृजन-03/05/2021

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साहित्य संगम संस्थान
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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-03/05/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी-
1.आ.दीपमाला तिवारी
2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. संगीता मिश्रा जी
2.आ. विक्रम साहू  जी
3. आ. सुधा चतुर्वेदी मधुर  जी

श्रेष्ठ टिप्पणीकार-
1.आ. विक्रम साहू जी
          
     


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 हौसला/संजीवनी

मनुष्य का जीवन चक्र अनेक प्रकार की विविधताओं से भरा होता है जिसमें सुख- दु:खु, आशा-निराशा तथा जय-पराजय के अनेक रंग समाहित होते हैं । वास्तविक रूप में मनुष्य की हार और जीत उसके मनोयोग पर आधारित होती है । मन के योग से उसकी विजय अवश्यंभावी है परंतु मन के हारने पर निश्चय ही उसे पराजय का मुँह देखना पड़ता है ।
मनुष्य की समस्त जीवन प्रक्रिया का संचालन उसके मस्तिष्क द्‌वारा होता है । मन का सीधा संबंध मस्तिष्क से है । मन में हम जिस प्रकार के विचार धारण करते हैं हमारा शरीर उन्हीं विचारों के अनुरूप ढल जाता है । हमारा मन-मस्तिष्क यदि निराशा व अवसादों से घिरा हुआ है तब हमारा शरीर भी उसी के अनुरूप शिथिल पड़ जाता है। हमारी समस्त चैतन्यता विलीन हो जाती है ।दोनों प्रकार के व्यक्तियों के गुणों का यदि आकलन करें तो हम पाएँगे कि असफल व्यक्ति प्राय: निराशावादी तथा हीनभावना से ग्रसित होते हैं ।
ऐसे व्यक्ति संघर्ष से पूर्व ही हार स्वीकार कर लेते हैं । धीरे-धीरे उनमें यह प्रबल भावना बैठ जाती है कि वे कभी भी जीत नहीं सकते हैं । वहीं दूसरी ओर सफल व्यक्ति प्राय: आशावादी व कर्मवीर होते हैं । वे जीत के लिए सदैव प्रयास करते हैं ।कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे जीत के लिए निरंतर संघर्ष करते रहते हैं और अंत में विजयश्री भी उन्हें अवश्य मिलती है । ऐसे व्यक्ति भाग्य पर नहीं अपितु अपने कर्म में आस्था रखते हैं । वे अपने मनोबल तथा दृढ़ इच्छा-शक्ति से असंभव को भी संभव कर दिखाते हैं ।
मन के द्‌वारा संचालित कर्म ही प्रधान और श्रेष्ठ होता है । मन के द्‌वारा जब कार्य संचालित होता है तब सफलताओं के नित-प्रतिदिन नए आयाम खुलते चले जाते हैं । मनुष्य अपनी संपूर्ण मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं का अपने कार्यों में उपयोग तभी कर सकता है जब उसके कार्य मन से किए गए हों ।
सफलता प्राप्ति में यदि विलंब भी होता है अथवा उसे अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है तब भी वह क्षण भर के लिए भी अपना धैर्य नहीं खोता है । एक-दो चरणों में यदि उसे आशातीत सफलता नहीं मिलती है तब भी वह संघर्ष करता रहता है और अंतत: विजयश्री उसे ही प्राप्त होती है ।
इसलिए सच ही कहा गया है कि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ । हमारी पराजय का सीधा अर्थ है कि विजय के लिए पूरे मन से प्रयास नहीं किया गया । परिस्थितियाँ मनुष्य को तभी हारने पर विवश कर सकती हैं जब वह स्वयं घुटने टेक दे ।
शारीरिक और नैतिक दो प्रकार के साहस मनुष्यों में होते है, किसी के पास शारीरिक साहस होता है तो किसी के पास नैतिक साहस। परिस्थिति के हिसाब से ये उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वो किस साहस का परिचय देता है। नैतिक साहस वह गुण नहीं है जो सभी के अंदर निहित होता है। कुछ खास लोगों में ही ये मौजूद होता है|



संगीता मिश्रा

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 हौसला / संजीवनी

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जिंदगी का एक महत्वपूर्ण अंग है असफलता । मानव जीवन में कई बार हालात ही कुछ ऐसे बन जाते हैं कि व्यक्ति पूर्ण रूप से टूट कर बिखर जाता है । यहां पर उसका केवल हौसला ही काम आता है। 
जो उसके शरीर में नव चेतना का संचार करेगा। 

हार तब तक नहीं होगी,जब तक तू उसे स्वीकार न कर ले,गिर कर फिर संभलना,यही तेरे हौसले की जीत है ।
अगर जिंदगी में कुछ हासिल करना है तो अपने तरीके बदलो इरादे नहीं ।किसी ने क्या खूब कहा है , कौन कहता है यारों आसमां में छेद नहीं हो सकता, जरा तबीयत से पत्थर तो उछालो । कहने का मतलब है कोशिश करके देखना जरूरी है । क्यों कि कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती । मन में है विश्वास तो जग फतह कर सकते है ।इच्छाशक्ति प्रबल होनी चाहिए । सतत् प्रयास करते रहना चाहिए ।मंजिल उसी को मिलेगी जो खुद की सहायता करेगा । संजीवनी की तरह आपके अंदर एक नई ऊर्जा का उदय होगा । आप स्वयं ही सबसे अच्छे मित्र होते है खुद के ,जरूरत है पहचानने की अपने अंदर की शक्ति की ।

राह कैसी भी हो अगर ठान लो तो फिर पीछे मत मुड़ो।पूर्ण एकाग्रता से,लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समर्पित तन मन से मेहनत करे। एक बात का विशेष ध्यान रखें , कभी हताशा के भं वर में न फंसना ।

सफलता ,असफलता के बाद ही मिलती है । असफलताओं की सीढ़ियां चढ़ कर ही आप मंजिल को पा सकते हैं ।सलाह सबकी सुनो, करो अपने मन की । सही सलाह, सही वक्त पर मिले उसे दिल - दिमाग माने तो स्वीकार करें।

 आज के समय में महामारी फैली है । प्रतिदिन अखबारों में पड़ने आता है कि 104 वर्षीय  बुजुर्ग ने कोराना को मात दी या 94 वर्ष की महिला ने कोरो ना  को हराया । इन खबरों से हम प्रेरणा मिलती है कि किसी भी उम्र में हम कमजोर नहीं होते । अपनी प्रबल इच्छा शक्ति से किसी भी स्थिति में हम अपनी चुनौतियों का सामना डट कर सकते हैं ।

न बन सको सूरज
 तो क्या ?
दिया बन के उजाला करो । 

परिणाम नहीं हमारे हाथों में 
तो क्या ?
प्रयास तो हम फिर भी करेंगे । 

जिंदगी को जिएंगे , हौसलों के साथ। 
। जय हिन्द ।




🙏
विक्रम साहू 
भोपाल,मध्य प्रदेश

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माँ का हौंसला 

माँ नींव परिवार की , बरगद जैसा वृक्ष ।
माँ बिन ना गाडी़ चले, सब देखें प्रत्यक्ष ॥

माँ एक ऐसा कोमल शब्द है जो दो होठों के भिड़ने से ही उच्चरित हो जाता  है , बच्चा इसीलिए पहले माँ बोलना सीख लेता है । उसके बिना परिवार का कोई भी रखवाला और सहारा नहीं होता । माँ विषम विपरीत परिस्थितियों में भी हौंसला रखते हुए  अपने परिवार की खुशियों में कोई व्यवधान नहीं  आने देती । अपने बच्चों की गुरु होती है माँ ......

        माँ जैसा कोई गुरु न होता ,
         माँ जैसी ना सीख मिले।
       माँ के हौंसले की सीढ़ी पर ,
          चढ़कर के परिवार बढ़े ।

जिन्दगी की गाड़ी को वह बहुत ही साहस , धैर्य , लगन और हिम्मत से खींचती हुई आगे बढ़ाती रहती है । 
   माँ कोई भी हो नर की या पशु पक्षी की , जीव की या  जानवर की वो अपने बच्चो की परवरिश को जान भी लुटा देती है । बयां  पक्षी का घऱ देखो कैसा थैले की तरह पेड़ पर लटक जाता है जिसे वह एक एक तिनके को लाकर बनाती है और खतरे का संकेत होने पर दूसरे वृक्ष पर टांग देती है ।मादा  कंगारू अपने  बच्चों को कैसे सुरक्षित रखती है , मादा बंदर अपने बच्चों को आसानी से चिपका  कर लम्बी छलांग लगा  लेती है ये उसका हौंसला ही है कि  बच्चा गिरता नहीं है । गाय भी पहले अपने बच्चे को दूध पिलाती है फिर दूध देती है नहीं  तो टांग मारती है दूध नहीं  देती । ये एक चिड़िया का हौंसला ही होता है कि वो मुँह में दाना भर कर लाती  है और अपने बच्चों का पेट भरती है आकाश को चीर  कर आना उसका जद्दोजहद का परिणाम है। 
माँ का हौंसला जब देखने लायक होता है जब एक जवान माँ का सहारा छिन  जाता है और अगर वो  अशिक्षित भी है तो भी मेहनत मजदूरी करके बच्चों की  परवरिश कर लेती है कितनी ऐसी माँ  के बच्चे IASऑफीसर तक बन जाते है । वो अकेली माँ उनके पिता का भी भार  उठा लेती है । परिवार की परवरिश की खातिर वो उनकी सुधि रखती हुई अपनी सुधि बुधि त्याग देती है ।प्णे बच्चों की पहली पाठशाला माँ हीं होती है ।
      माँ का हौंसला सख्त बुलंद होता है उसकी उड़ान के पँख बहुत लंबे होते है । सभी आपदा विपत्ति में वो हौंसले से ही सामंजस्य कर के सफलता पा लेती है । जीवन की हर उलझी गुत्थी का छोर उसके पास होता है यानि माँ के हौंसले का कोई सानी नहीं ।

       अविरल प्रेम की धार है माँ ,
       असीम हौंसला वो रखती ।
        प्राणों की बाजी से खेले ,
         भव्य उड़ानें वो भरती ।



स्वरचित     सुधा चतुर्वेदी मधुर 
                       मुंबई

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