दैनिक श्रेष्ठ सृजन-21/04/2021

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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-21/04/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी- 
1.आ.दीपमाला तिवारी
 2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. घनश्याम सहाय जी
2.आ. ऐश्वर्या सिन्हा चित्रांश जी
3. आ. डॉ० भावना दीक्षित ज्ञानश्री जी



श्रेष्ठ टिप्पणीकार- 
1.आ. अर्चना वर्मा जी
           
      
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 #नमन मंच
विषय अति समृद्ध है और विषय प्रदाता का कौशल,विषय से भी अधिक समृद्ध।विषय पढ़ कलम स्वतः हाथ में आ गई बिना किसी विरोध के।
देश के महान विचारक महात्मा विवेकानंद ने कहा-"स्वस्थ्य शरीर में स्वच्छ आत्मा निवास करती है"।यदि शरीर स्वच्छ है तो आत्मा स्वच्छ है और यह आपकी स्वच्छ आत्मा,आपके लिए समस्त संसार को सुन्दर बना डालती है।
तन और मन में अन्योन्याश्रय संबंध है दोनों ही एक दूसरे से बँधे हुए हैं।यदि आपका तन स्वस्थ्य और सुन्दर है तो तो आपका मन अर्थात मस्तिष्क भी स्वस्थ्य और सुन्दर होगा।आपका मष्तिष्क ही आपके सारे शारिरिक और मानसिक क्रियाओं का केन्द्र-विन्दु है,समन्वय केंद्र है।तन शिथिल हुआ,मन शिथिल होगा, मन शिथिल होगा समस्त मानसिक और शारीरि क्रियायें शिथिल पड़ जायेंगी।शारिरीक और मानसिक क्रियाओं के शिथिल पड़ जाने का अर्थ है "देह" का अक्रियाशील हो जाना और जहाँ क्रियाशीलता समाप्त होती है वहाँ जीवन शेष हो जाता है।अब यह आपको सोचना है क्रियाशील रहना है या शेष हो जाना है।
"शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्" महाकवि कालीदास नें उपनिषद के इस श्लोक की चर्चा,अपनी रचना कुमारसम्भव में किया है।कवि कालीदास लिखते हैं-'हमारा शरीर धर्म का मुख्य साधन है"।--जहाँ स्वस्थ्य शरीर है वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है वहाँ ईश्वर है।
 आज के इस भागम-दौड़ के जीवन में कोई स्वस्थ्य नहीं, कोई मधुमेह से ग्रसित है,तो कोई रक्तचाप से।हर ओर अस्वस्थ्य लोगों की कतारें लगी हैं, कारण,व्यक्ति अपनी भौतिक सुविधाओं के भँवरजाल में इस कदर उलझ चुका है कि उसे स्वस्थ्य तन छोड़कर,उसे हर वह कुछ चाहिए जो उसे सिद्धांततः नहीं चाहिए।यदि इस धरती पर धर्म की स्थापना चाहते हैं तो स्वस्थय तन का निर्माण कीजिये या फिर "अधर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे" करते रहिए।
व्यायामं लभते स्वास्थयं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थयं सर्वार्थसाधनम्
व्यायाम से स्वास्थ्य, लंबी आयु,बल और सुख की प्राप्ति होती है।निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से सभी कार्य सिद्ध होते हैं।
स्वस्थ्य रहें,निरोग रहें।
ईश्वर आपके तन में स्वस्थय मन का वास कराये।



घनश्याम
डुमरांव, बक्सर, बिहार

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 शरीरमाध्य्म खलु धर्म साधनम ---वैचारिक निबंध

शरीर की महत्ता हमारे देश में लगभग 5000 वर्ष प्राचीन ग्रंथो में उल्लिखित है. प्राचीन विद्वानों ने कहा है --
*** बड़े भाग मानुष तन पावा **** वहीं यह भी बताया गया है कि *** 84 लाख योनियों के बाद जीव को मानव जन्म मिलता है ***
ऐसे दुर्लभ जन्म, जीवन और मानव शरीर को हमें स्वस्थ, सुन्दर और सदाचारी, सद्गुणों से युक्त बनाना चाहिए और बुरे विषयों, आदतों, संगतो, व्यासनों, कार्यों से दूरी बनाए रखना चाहिए.
लोगों ने कहा है कि *** प्रथम आवश्यकता निरोगी काया *** यह शत -प्रतिशत सत्य है. स्वस्थ और निरोगी शरीर ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ उपहार है. आज के भौतिकतावादी युग में लोग मशीनी ज़िन्दगी जीने लगे है. दिनभर पैसा कमाने की भागमभाग, अनियमित दिनचर्या, वक़्त -बेवक्त खाना, सोना, जागना, शारीरिक श्रम का अभाव, नौकरों पर आश्रित रहना आदि ऐसे कारण हैं जिनसे मानव शरीर रोगों का स्थायी निवास बनता जा रहा है.
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है ----
**** हमें अपने देश के लोगों में स्टील की नसें और फौलादी बाजुयें चाहिए जो अनवरत परिश्रम करें और देश को समृद्ध बनाएं *****
परिश्रम हेतु ताकत चाहिए, ताकत के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए और स्वस्थ शरीर हेतु पोषण और नियमित दिनचर्या चाहिए. इन सभी के लिए जागरूकता चाहिए.
धर्म पालन अत्यंत आवश्यक आवश्यकता है. सर्वोच्च धर्म है मानव सेवा. स्वस्थ शरीर द्वारा ही धर्म, कर्म, त्याग तपस्या, मानव सेवा, प्राणी मात्र की सेवा आदि कार्य संभव हो पाते हैं.
व्यास मुनि ने कहा है -----
**** अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम द्वयं,
परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम.****
अर्थात 18 पुराणों के रचयिता व्यास जी ने परोपकार को पुण्य और परपीड़ा को पाप कहा है.
पुण्य और पाप दोनों ही शरीर की क्षमता पर निर्भर करता है.
**** बड़े भाग मानुष तन पावा **** अतः हमें अपनी ऊर्जा, शरीरिक दक्षता, क्षमता, काबिलियत आदि को मानव सेवा, प्राणी मात्र की सेवा और राष्ट्र सेवा में समर्पित करना होगा. स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन और ह्रदय निवास करता है. ऐसा हमारे प्राचीन ग्रन्थ बताते हैं. अतः हमें स्वस्थ, सुन्दर, सकारात्मक, सुसंस्कृत जीवन जीना होगा. यही मानव धर्म है. स्वस्थ सकारात्मक विचार, शुद्ध भोजन, स्वक्षता, योग, संयम, नियम सहित अनुसाशित और मर्यादित जीवन जीना होगा. जय हिन्द.


नोट
-------== यह मेरा निजी, मौलिक लेख है.
लेखिका
ऐश्वर्या सिन्हा चित्रांश
वाराणसी

★★★★★★★

 शरीर मांद्द खलु धर्म साधनम


"शरीर माद्दं खलु धर्म साधनम्" महाकवि काली दास ने उपनिषद की रचना की व्याख्या करते समय इस श्लोक की चर्चा अपने काव्य ग्रंथ कुमार सम्भव में की है।वे व्याख्या करते हुए कहते  है कि  हमारा शरीर धर्म का मुख्य साधन है।जहाँ स्वस्थ शरीर है वहाँ धर्म है।  जहाँ धर्म है, वहाँ चिन्तन और  मनन हैं।  जहाँ चिन्तन और  मनन हैं वहां  कर्तव्य है । जहाँ  कर्तव्य है,  वहाँ संयम,  नियम है जहाँ संयम, नियम   यह है वहाँ मानव स्वस्थ हैं, पर भाग दौड़ भरी  जिन्दगी में स्वस्थ रहना आसान कार्य  नहीं है।  सभी किसी न किसी कारण के चलते अनेक या कुछ  रोगों से ग्रस्त है। अस्वस्थता तन के साथ मन को भी घेर लेती  है।
आज हम  सभी लोग भौतिक सुख के सुविधाओं के पीछे भाग कर सम्पन्नता के भँवर जाल में फंस गए  है , जो तन को आराम तलब बनाता है । और रोगों को बढ़ावा देता है।  
इसी लिए कहा गया है,  सात्विक भोजन करना चाहिए।  ज्यादा  सुख सुविधाओं के पीछे न भाग कर शरीर से यथाशक्ति कार्य लेना चाहिए।  मन को परोपकार और मानवता के  कार्यों में लगाना चाहिए।  मानवीय मूल्यों और संवेदनाओ को मन में विचरण करने दें,  जिससे मन स्फूर्ति वान रहेगा।  
तन,  मन की स्वस्थता भावों और विचारों को भी स्वस्थ व स्वच्छ रखेगी।  
यही मानव स्वभाव है,  यही मानव धर्म हैं। 



डॉ भावना दीक्षित ज्ञान श्री
 जबलपुर मध्यप्रदेश
      ★★★★★★★

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