दैनिक श्रेष्ठ सृजन-20/04/2021

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साहित्य संगम संस्थान
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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-20/04/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी- 
1.आ.दीपमाला तिवारी
 2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. रवि रश्मि अनुभूति जी
2.आ. पूनम सिन्हा "प्रीत" जी
3. आ. डॉ ० ओऽम् प्रकाश मिश्र 'मधुब्रत' जी



श्रेष्ठ टिप्पणीकार- 
1.आ. डॉ ० ओऽम् प्रकाश मिश्र 'मधुब्रत' जी
           
      
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 विष्णु पद छंद 
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विधान ~
16 , 10 पर यति , चार चरण , दो - दो समतुकांत, चार चरण ।

  माँ 
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सही - सही माँ राह दिखाती , 
              पूजी जाती माँ।
माँ का हर पल सम्मान करो , 
              देखे हर पल माँ ।।

माँ का देवी का दर्जा है ,
              करते हम पूजा । 
नाम जपने से कोई अलग , 
              नहीं काम दूजा ।।
चरणों में सिर रख कर हम तो , 
              हरदम पूजें माँ ।
माँ का हर पल सम्मान करो , 
              देखे हर पल माँ ।।

माँ की ममता है वट वृक्ष - सी ,   
             माँ ही सरमाया ।
सारे संकट माँ हरती है ,
              माँ शीतल छाया ।।
प्यारी नींद सुला देती है ,
              आँचल ओढ़े माँ ।
माँ का हर पल सम्मान करो , 
              देखे हर पल माँ ।।

निस्वार्थ भाव सेवा करती ,
              माँ बड़ी पुजारी ।
सब दुख हरने वाली माँ है , 
              माँ बड़ी दुलारी ।। 
पीड़ा में है देखे बच्चा , 
              रो देती है माँ ।
माँ का हर पल सम्मान करो,  
              हर पल देखे माँ ।।

संबल बन बच्चों का वह तो ,
              संस्कार सिखाती ।
निराशा से गिरते देख माँ , 
              आशा बन जाती ।।
संकल्प से डिगने दे न माँ , 
              मंज़िल बनती माँ ।
माँ का हर पल सम्मान करो , 
              हर पल देखे माँ ।।

सही - सही माँ राह दिखाती ,
              पूजी जाती माँ ।
माँ का हर पल सम्मान करो , 
              हर पल देखे माँ ।।
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(C) रवि रश्मि 'अनुभूति '
मुंबई   ( महाराष्ट्र ) ।
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●●C.
★★★★★★★

माँ
विधाता छंद आधारित गीत


सृजन आधार होती माँँ,धरा पर प्यार होती माँ ।
सकल शक्तिस्वरूपा है,सदा साकार होती माँ ।।

सदा ममता लुटाती है,यही ममतामयी मूरत।
करे ये स्नेह की बारिश,यही है प्रेम की सूरत।।
जगत जननी यही होती,जहाँ की सार होती माँ।
सकल शक्तिस्वरूपा है,सदा साकार होती माँ।।

अगर बच्चे सलामत हों,सदा खुशियाँ लुटाती है।
अगर बच्चे रहें गम में,उन्हीं पे जाँ गँवाती है।।
रही बच्चों कि खातिर तो,सदा लाचार होती माँ।
सकल शक्तिस्वरूपा है,सदा साकार होती माँ।।

बुरी नजरें न दे पड़ने,करे हर वक्त रखवाली।
कभी दुर्गा बने रहती,कभी चंडी कभी काली।
डरें बच्चे जरा भी तो ,सदा खुंखार होती माँ।
सकल शक्तिस्वरूपा है,सदा साकार होती माँ।।

सृजन आधार होती माँ,धरा पर प्यार होती माँ।
सकल शक्तिस्वरूपा है,सदा साकार होती माँँ।।

स्वरचित एवं स्वप्रमाणित


पूनम सिन्हा "प्रीत"
देवघर, झारखंड।

★★★★★

माँ--- चौपाई छंद / अवधी भाषा
       शीर्षक-- माँ
  त्रिभुवन तीन लोक जग माही! 
  माँ ते बड़ा कतहुँ कोउ नाहीं!! 
  सुर नर मुनि पूजहिं सब माता! 
  जन्म विधात्री संकट त्राता!! 

   सबहिं भांति सेवा जिन्ह कीन्हीं! 
    सुफल जनम तिन्ह आपनु कीन्हीं!! 
     सकल पदारथ पायो तिनहीं ! 
     मातु असीस दीन्ह जिन जिनहीं !! 



@ सर्वथा मौलिक सृजन
© डॉ ० ओऽम् प्रकाश मिश्र 'मधुब्रत'
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