दैनिक श्रेष्ठ सृजन-12/04/2021

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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-12/04/2021#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वरी- 
1.आ.दीपमाला तिवारी
 2.आ.सरिता तिवारी 'राखी'

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

श्रेष्ठ रचनाकार-
1.आ. ब्रह्मनाथ पांडेय मधुर जी
2.आ. डॉ अनीता राजपाल  जी


 
 
श्रेष्ठ टिप्पणीकार- 
1.आ. बजरंगलाल केजड़ीवाल जी
           
      
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 पराधीन सपनेहु सुख नाही:- संवाद

       शाम का समय है| धीरज और नीरज बैठे गप लड़ा रहे हैं| इसी श्याम आ जाता है| वे दोनों उसे देखकर खुश हो जाते हैं| श्याम बैठ जाता है| वह उन दोनों से कहता है कि आज एक महत्वपूर्ण बिषय पर चर्चा करनी है| दोनों एक साथ पूछ लेते हैं कौन सा बिषय|
श्याम:- वास्तविक सुख कब और कैसे मिलता है? 
धीरज:- बहुत ही गंभीर बिषय है|
नीरज:- वास्तव में गंभीर बिषय है|
श्याम:- कोई तो कुछ बताओ|
धीरज:- मुझे अपने दादा जी की एक पुरानी बात याद आ रही है| उन्होंने बताया था कि दूसरे के अधीन रहना सबसे बड़ा दुख है|
नीरज:- हां मित्र, सही कहे| मुझे भी मेरे हिन्दी के गुरु जी ने तही बात बतायी थी| जब मै कक्षा सात में पढ़ता था|
श्याम:- अब हम सभी सही दिशा में वार्ता कर रहे हैं| 
धीरज:- इसको ऐसे ही समझो| जब भारत आजाद नहीं था तो बड़ी दिक्कत होती थी|
नीरज:- सही बात है| एक मेरे पिता जी भी ऐसी ही बात बतायी थी कि जब भारत गुलाम था तो अपने ही घर में कैद होकर लोग रह गये थे|
श्याम:- पराधीनता दुख स्वाधीनता सुख की पर्याय है|
नीरज:- लोग कहते हैं न कि स्वतंत्रता में एक पल रहना नर्क के करोड़ों वर्ष की भी तुलना नहीं हो सकती|



                स्वरचित/ मौलिक
            ब्रह्मनाथ पाण्डेय' मधुर'
ककटही, मेंहदावल, संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश

★★★★★★

 पराधीन सपनेहुं सुख नाहिं  - संवाद 


स्थान - विज्ञान प्रयोगशाला
पात्र - गाईड व शोधार्थी
समय - 11.30 बजे

गाईड डॉ बलदेव कुमार अपने तीन शोधार्थियों - हरीश, अनुपमा व अनीता के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए शोध कार्य की प्रगति के विषय में चर्चा कर रहे थे। बात - चीत के बीच में डॉ हरीश बोले - " सर मुझे बाहर भिजवा दो जी" 
"बाहर कहाँ " सर बोले 
हरीश : " जी विदेश जाने की बहुत इच्छा है" 
" न विदेश पतासे लेने जाना है!" व्यंग्यात्मक लहजे के साथ सर बोले। 
" सर बाहर बहुत मौज है, पैसा बरसता है। सुविधाएँ भी बेइन्ताह उपलब्ध हैं। यहाँ तो सिर्फ़ मारामारी है कोई पूछता ही नहीं है। " हरीश ने पूरे जोश से अपना मत रखा। 
गाईड सर ने अनुपमा और अनीता की ओर देखकर उनका मत जानने का प्रयास किया। 
दोनों ने ही एक आवाज़ में कहा " सर, हमें तो अपना देश प्रिय है। " 
" बिल्कुल सही, शाबाश! अपनी मिट्टी से जुड़ कर रहने से बड़ा सुख कोई नहीं है। बाहर रहकर अजनबीपन में जीने से अच्छा है यहाँ थोड़े कम में सब्र कर लो पर स्वतंत्र तो रहोगे। पराए देश में तुम्हें सदा गुलामी का अहसास होगा। बच्चो मेरा तजुर्बा यह कहता है कि पराधीन सपनेहुं सुख नाहिं। 
मैं जब पढ़ने के लिए इंग्लैंड गया था तो सब कुछ होते हुए भी अपनेपन व खुलेपन की कमी को हरदम महसूस किया था। " 
ठण्डी साँस भरते हुए सर बोले " सोचो, विचारो और अपने देश के लिए चिन्तनशील बनो। "
" जी सर आप सही कह रहे हैं। दूर जाकर तो मैं अपने माँ - बाप, भाई - बहन, मित्रों से कट जाऊँगा। मैं यहीं रहकर अपने काबलीयत से समाज को लाभान्वित करने का प्रयास करूँगा। " चहक भरी आवाज़ में हरीश ने जवाब दिया। 
स्वदेश हेतु एक सच्ची सोच जागृत कर चारों के चेहरे पर शान्ति के सुखद भाव झलक रहे थे। 



डॉ अनीता राजपाल 
हिसार, हरियाणा ।
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