# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-02/11/2020#

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# दैनिक श्रेष्ठ सृजन-02/11/2020#

संपादक (दैनिक सृजन) - आ.वंदना नामदेव
पंच-परमेश्वर- आ.विनोद वर्मा दुर्गेश

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हार्दिक शुभकामनाएँ🌷🌻🌹

विषय-शरदोत्सव
विधा-संवाद
दिनांक-2/11/2020

श्रेष्ठ रचनाकार
1)आ.सरिता तिवारी जी
2)आ.जयश्रीकांत जी
3)आ.सुनीता रानी राठौर जी
श्रेष्ठ टिप्पणीकार-आ.राजाबाबू दुबे जी



1)
शरदोत्सव में दो बहनों की आपसी बातचीत कुछ इस प्रकार होती है कि वह शरद पूर्णिमा की पूजा विधि को लेकर असमंजस में हैं।
आइए मिलते हैं दोनों बहनों से___

जयश्री___(बड़ी बहन सरिता से)
        दीदी इस शरद पूर्णिमा          की पूजा हम कैसे करते हैं?
सरिता (जय श्री की बड़ी बहन)_क्या रे तुझे इतना भी नहीं पता।

जयश्री_दीदी पता होता तो मैं आपसे क्यों पूछती?
सरिता_ हां ये तो है।
जयश्री_तो बताओ ना कैसे पूजा करते हैं?
सरिता_चल बताती हूं ।
           शरद पूर्णिमा के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके और अपने मंदिर में भगवान की पूजन कर दिन भर व्रत रहने का संकल्प करते हैं। दिन भर व्रत रखकर शाम को चंद्रोदय होने के पश्चात मां तुलसी को चौक पुरकर पटा में रखते हैं और डेढ़ पाव मावा व डेढ़ पाव शक्कर मिलाकर छह पेड़े तैयार करते हैं उन्हें पेड़ों की पूजा की जाती है और चंद्रमा को अरग देते हैं चंदन वंदन रोली अक्षत कर दीपक से आरती कर प्रणाम करते हैं। बने हुए छह पेड़े में से एक पति को एक सखी को एक गर्भवती स्त्री को एक ग्वाल वालों को एक तुलसी मां को अर्पित करते हैं और एक का सभी को प्रसाद बांट देते हैं।
इस प्रकार विधि विधान से मां तुलसी और चंद्रमा की पूजा कर शरद पूर्णिमा की पूजा संपन्न होती है।
     हमारे पूर्वज कहते हैं कि शरद उत्सव में कुछ देर हमें चांदनी रात में अवश्य बिताना चाहिए। क्योंकि इस रात्रि को अमृत वर्षा होती है जो हमारे सभी रोग और दोष नष्ट करती है। इस रात्रि को कीर्तन भजन आदि का आयोजन भी किया जाता है।

जयश्री_वाह दी आपने तो बहुत बढ़िया जानकारी दी। अब से मैं हर वर्ष शरद पूर्णिमा को व्रत और पूजन करूंगी।
सरिता_सच है करना ही चाहिए। हमारे पूजन करने से हमारे घर परिवार बच्चे सभी को सुख समृद्धि बुद्धि आदि की प्राप्ति होती है।
जयश्री__हां दीदी।आपका बहुत-बहुत धन्यवाद इस बात का मैं पूर्णता ख्याल रखूंगी।

इस प्रकार दो बहनों के संवाद में शरद उत्सव पर शरद पूर्णिमा के व्रत की पूजा विधि विधान से किस प्रकार करना चाहिए इस बात की जानकारी छोटी बहन जय श्री को मिली जो अब से हर वर्ष चंद्रमा और मां तुलसी का विधिपूर्वक पूजन और व्रत करेगी।



सरिता तिवारी'राखी'
जबलपुर मध्यप्रदेश

2)
      "शरद का मेला"

दोपहर का समय है। द्वार की घंटी बजती है। अमृत  उत्सुकता से दौड़कर दरवाजा खोलता है। देखता है द्वार पर उसका मित्र अबीर आया हुआ है ।

अबीर -  अमृत आज शाम में हम मेले जाएंगे । तू चलेगा?
अमृत - (आश्चर्य चकित हो कर)  मेला !!  कैसा मेला???
अबीर - अरे!! तुझे नहीं मालूम क्या , यहां विंध्य नगर सिंगरौली में बहुत बड़ा मेला लगता है हर साल , " शरद  मेला " , बहुत मजा आता है अमृत वहां ।
अमृत - अच्छा!! पर मुझे तो जानकारी नहीं है अबीर । 
अबीर - हां ,तुम अभी आए हो ना यहां इसलिए। हम तो दो साल से मेला में जातें है । बहुत मजा आता है शरद मेले में।

(तभी वहां अमृत की माता का आगमन होता है और वह अमृत से पूछतीं है) -
माता जी - अमृत कौन है वहां द्वार पर ??
अमृत - आई , अबीर आया है , कहता है मेले में जाएगा शाम को , पूछ रहा है तुम भी चलोगे । आई , ये शरद मेला क्या है? बताइए ना ।
अबीर - नमस्ते आंटी जी ,  हां आंटी जी , बताइए ना ।
माता जी - नमस्ते ,आओ अबीर अंदर आओ , बैठो । मैं तुम लोगों को शरद मेले के बारे में अवश्य बताऊंगी ।
अमृत - आई , शरद मेला क्यों और कब मनाया जाता है ??
माता जी - अमृत ,अबीर , मौसम के बदलाव के अनुसार हमारे भारत वर्ष में ऋतुओं को छ: भागों में विभाजित किया गया है । ग्रीष्म , वर्षा , शरद हेमंत, शिशिर ,वसंत । इन्हीं ऋतुओं में से एक ऋतु शरद है ,जिसका आगमन इस समय होता है ,वर्षा ऋतु की समाप्ति के पश्चात। 
   इस समय नदियों का जल स्वच्छ हो जाता है , आकाश बादल रहित स्वच्छ दिखाई देता है, हल्की सी ठंड पड़ने लगती है , तरह तरह फूल खिलते हैं, त्योहारों का समय भी आ जाता है । धान की फसल कटाई होती है। चारों ओर खुश नुमा वातावरण हो जाता है। आकाश में चन्द्र अपनी सोलह कलाओं से साथ भ्रमण करता है। इसे देख लोग बहुत आनंदित होते हैं।  लोग उत्सव प्रिय होते है , अतः जगह जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संगीत ,नृत्य , कवि सम्मेलन आदि के द्वारा शरदोत्सव मनाया जाता है। सभी जन इससे प्रसन्न होते है।
अबीर - आंटी जी तो ये मेला शरद ऋतु के आगमन की खुशी में होता है ?
माता जी - हां अबीर यह मेला भी लोगों के मनोरंजन एवम् इस सुहानी शरद को अधिक आनंदित बनाने के लिए ही होता है। सभी बच्चे ,बड़े ,बूढ़े , स्त्री ,पुरुष सभी मेले में जाकर खुश होते हैं और शरद ऋतु के आगमन का उत्सव मनाते है।

(तभी वहां अमृत का बड़ा भाई अक्षत भी आ जाता है और कहता है) - 
अक्षत - आई , मैंने आप सभी का वार्तालाप सुना है, बहुत आनंद दायी है ये शरदोत्सव , मैं भी इस मेले में जाना चाहता हूं आई, क्या हम भी चलें ?? 
अबीर - जी दादा , अवश्य ही हम सब चल सकते हैं ।
माता जी - हां बच्चों हम अवश्य जाएंगे ।
सभी बच्चे (मिलकर)  - वाह!!!
आज तो वाकई बहुत मज़ा आएगा शरदोत्सव के विंध्यनगर मेले में।
माता जी - तो ठीक है बच्चों , अब तुम सब मेले में जाने की तैयारी करो। 
सभी बच्चे -(खुश होकर) जी बिल्कुल ।
   और सभी चले जाते हैं।


-जय श्रीकांत

3)
(तीन सहेलियों की आपसी संवाद)

गीता--देखो आज चांद कितना चमक रहा है!

रीता- हां,तुम्हें पता नहीं आज शरद पूर्णिमा है।
 आज का चांद 16 कलाओं से परिपूर्ण हो 
  दृश्यमान होता है।
  
सीता--हां हमारे गांव में शरदोत्सव का मेला भी लगता है। भारतीय सनातन संस्कृति में शरदोत्सव का अलग महत्व है। शरद ऋतु के आगमन के साथ शरदोत्सव मनाया जाता है।

गीता--अच्छा! हम सब हॉस्टल में रहते-रहते अपने पर्व और शुभ मुहूर्तों को भी याद नहीं रख पाते।

 रीता-- आज महिलाएं व्रत रखकर लक्ष्मी पूजन भी करती हैं। खीर बनाकर अंबर के नीचे रखती हैं। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों से वसुंधरा पर अमृत वर्षा होती है और जगत में सुख-शांति, समृद्धि प्राप्त होती है।
 
सीता--तुम्हें पता है आज के चांद की खूबियां आयुर्वेदिक औषधियों के रूप में माना जाता है। वातावरण स्वच्छ होने के कारण विशेष कर श्वास रोगी के लिए सुखदाई माना जाता है।

रीता-- यह भी कहा जाता है कि आज के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर गोपियों संग रास लीला रचाई थी। कृष्ण स्वयं चांद बने थे और राधिका चांदनी।

सीता--इस शुभ मुहूर्त को ब्रह्मा-जीव के मधुर मिलन के रूप में भी जाना जाता है।आज के चांद को 'शरद पूर्णिमा की चांद महारास वाली' भी कहा जाता है।

 गीता-- अरे वाह! इतना अद्भुत अविस्मरणीय शुभ दिन। तभी तो आज के चांद की चमक चटक चांदनी किरणें निराली महसूस हो रही हैैं।



 सुनीता रानी राठौर 
ल ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
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